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जिनगी की घट्टी मँऽ दळई जायगऽ


लक्कड़ जसो बळई जायगऽ
मर्‌यो की सब तूखऽ लई जायगऽ
तीन कुंटल लाकड़ा थारो सोय बाँदी देगऽ,
कर्‌यो घमंड तो माटी जसो कलई जायगऽ
धापेल बामण नऽ भूक्या किरसाण सी नी बोलनूँ
नईं तो बेमन सी उल्टो-सीदो बोलई जायगऽ
लई जायेल कासट सी जवँऽ जगरो चतऽगऽ
देखतऽ देखतऽ तू आवखो बळई जायगऽ
बड़ा-बूढ़ा नऽ का आसीरवाद लिया कर,
नऽ जाणऽ उनकी काँ की वाक्या फळई जायगऽ
सुख को पूड़ नीच्चऽ दुख को ऊप्पर,
असी जिनगी की घट्टी मँऽ दळई जायगऽ
जिनगी तो छे गुड़ की भेली जसी,
राखी रुपया की गरमी तो रळई जायगऽ
घुस्सो आवऽ ओखऽ कदी लगाम दई दी
तो होण्यो महाभारत समज टळई जायगऽ
बईमानी नऽ अनेति का रस्तऽ कदी चल्यो तो
पाणी मँऽ सत्तू जसो घोळई जायगऽ
रूप-रंग का घमंड मँऽ कदी फसर्‌यो तो
थारी जवानी एक पळ मँऽ 'महेश' ढळई जायगऽ

- महेश साकल्ये (नईदुनिया)

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