बरवत इतरो बुरो तो नी है...
अब बी तितल्याँ उड़े हैं
नाना-नानी इसकूल जाइ र्या है
बद्दल बरसे है
और नद्दी भी ऊँडी कम है पन बेती जइरी है
अपणे बस थोड़ो और करनो है
जाणों है वणां मनखाँ की बस्ती में
जिणको जीवन अबे बी बदहाल है
विकास नी पोंच्यो है आखरी आदमी तक
भेदभाव अब बी है आदमी-आदमी में-
मिटाणो है, ने जाणो है एक नयो युग
ऊपर ती सब देखी र्या है गाँधी बाबा
वणां की आत्मा ने सुख देणो है-
तो सब धरम सब जात ने सब भासा का
लोग होण के प्रेम से रेणो है
यो उपदेस नी है आज का कवि मानस को
प्यार भरी करुण पुकार है
वक्त इतरो ज्यादा बुरो नी है
बोलो, कूण-कूण तैयार है?
- देवव्रत जोशी (नईदुनिया)

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