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पीजी कॉलेज के छात्र पढ़ रहे हैं मालवी का लोक साहित्य


मंदसौर। मंदसौर पीजी कालेज में मालव माटी की महक ने माहौल में अनूठी रंगत भर दी है। यहां पहली बार लोक साहित्य पढ़ाया जा रहा है। इसमें जाने-माने मालवी साहित्यकारों की रचनाएं नई पीढ़ी की जबान पर आ रही हैं। 'रामाजी रईग्या ने रेल जाती री...' और 'चटक म्हारा चंपा..' जैसी कविताएं पाठं्यक्रम का हिस्सा बन गई हैं। शा. महाविद्यालय में चालू शिक्षा संत्र से एमए उतरार्ध (हिंदी ) के विद्यार्थियों को मालवी साहित्य पढ़ाया जा रहा है। चतुर्थ वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल 'मालवी भाषा और उसका साहित्य ' को लेकर छात्रों ने अच्छी दिलचस्पी दिखाई है। करीब 45 छात्र-छात्राओं ने इसमें प्रवेश लिया है। इस विषय को पहली बार पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने से भूलती-बिसरती जा रही मालवी को संबल मिला है। मुहावरों और लोकोक्तियों के बहाने कानों में पड़ने वाली मालवी अब कैम्पस में गूंजने लगी है। आलम यह है कि बालकवि बैरागी की 'चटक म्हारा चंपा..' मालवा की चंपई संस्कंृंति की छटा बिखेर रही है तो हरीश निगम का काव्य खंड 'हरियालो आंचल' मालव भूमि की गौरव गाथा का बखान कर रहा है। पाठ्यक्रम में मालवी साहित्य के जाने माने नाम सिद्धेश्वर सेन, चंद्रशेखर दुबे, आनंदराव दुबे, मदनमोहन व्यास, भावसार बा, नरहरि पटेल, नरेंद्रसिंह तोमर की रचनाएं काव्य, नाटक और उपन्यास के रूप में शामिल की गई हैं। इस संबंध में कालेज प्राचार्य डा. ज्ञानचंद्र खिमेसरा का कहना है कि हिंदी केवल खड़ी बोली तक सीमित नहीं है। इसकी अनेक विभाषाओं में साहित्य सृजन किया जा रहा है। प्राचीन साहित्य तो मुख्य रूप से विभाषाओं में ही मिलता है। यही वजह है कि विक्रम विश्वविद्यालय ने मालवी को पाठ्यक्रम में शामिल किया।

(साभार: याहू हिंदी)

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