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नवा जमाना की बात


भिनसरे-उठवा को जमानो गयो
देर से जगने को जमानो आयो नयो
अबे सासू पेला उठे, बऊ जागे सासू का बाद
क्यूँ कि बहू देखे टीवी आदी आदी रात
मुंडा-हात धोवा का पेला बऊ-बेटा बिस्तर में चाय पीवे
सासू बापड़ी बनई ने धरे-ससरो देखी ने मुंडो सीवे
बबूल नीम की दातून अब अई-गई हुई गई है
बुरुश ने कोलगेट की ट्यूब घरे-घर अई गई है
तालाब का काला गारा से अबे कोई बी माथो नी धोवे
शेम्पू की बोतल में घर का पइसा खोवे
छकड़ा ने ताँगा में अब बऊ-बेटा नी बैठे
मोटर गाड़ी में बेठी ने इतरावे ने ऐंठे
लीपनो-छापनो तो दूर, अब बऊ झाड़ू तक नी काड़े
चौका बासन को कदी बोलो तो बऊ कपड़ा फाड़े
गाँव में चना-भूंगड़ा, सत्तू-धानी अब कोई नी खावे
गाँव का आलू की पपड़ी छोड़ी ने अंकल चिप्स को पेकिट लावे
बाप-दादा पुरखाना का खेतान में कॉलेज, कॉलोनी बनी री है
गऊँ, चना, साँटा की फसल की जगे इमारत तनी री है
आज आपस का रिश्ता छोटा होता जई रिया है
मिलनो-जुलनो छोड़ी ने सब टीवी में समई रिया है
पण एक बात नी बदली, आज बी सब नईदुनिया बाँचे
ने 'थोड़ी-घणी' का गीत पढ़ी-सुनी ने खुसी में नाचे।

-डीके रावल (नईदुनिया)

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