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इना बरस भी खूब बरस


इना बरस भी खूब बरस,
म्हारा इंदर देवजी सरस।
खेत जंगल न्हई रिया
खाल-नाल बेवई रिया।
मोर-पपैया कोयल मिली के
मंगल गान सुनई रिया।
इंदर धनुष देवे दरस।
इना बरस भी खूब बरस।
जईं देखो वईं हरयाली
हरयाली माय खुशयाली।
बेल बेलड़ी झाड़ चढ़या
हवा नवा जीजा की साली।
उकी बेग नखराली सारस,
इना बरस भी खूब बरस।
तलाब मे नाव हुलस
लहर लहर साके बेबस।
बंधई बदनवार बंधी गिया
एकाएक अने बरबस।
साले संगे जीवन रस,
इना बरस भी खूब बरस।

- गफूर 'स्नेही' (नईदुनिया)

प्रतिक्रियाएँ

Re: इना बरस भी खूब बरस
तमारो मालवी निमाड़ के हू रोज पढ़ु म्हारे अच्छो लागे। तमने कविता अच्छा लिखी मारी है। पेला तो अगहन आवेगा जते तमारा म्हारा इंदर देवजी सरस....
अस्वीकरण