म्हारो नानो काळू अंग्रेजी का चार अक्षर काई पढ़ी गयोज,
ओका दीमाग को पारो-सातवाँ आसमान पर चढ़ी गयोज।
मनऽ ओका लेणऽ देखी थी भला घर की एक छोरी,
काम धन्दा मऽ चतुर नऽ देखणा मऽ थी गोरी
ऊ ओखऽ पसंद नी आई-कैणऽ लग्यो ओकी तो-
चपठी नाक छे, पिचकायेल गाल छेल।
बड़ा-बड़ा डोळा छे नऽ उटड़ी सरीखी चाल छे,
बस एतरीज वात पर, पड़ेला बइल जसो अड़ी गयोज।
ओका दीमाग को पारो सातवाँ आसमान पर चढ़ी गयोज।
काम करऽ कौडी को नी, ताण मारी नऽ सोवऽ
पूजा-पाठ सब गई धाड़ मऽ चहा पी नऽ मुँडो धोवऽ
भाई को नी बइण को, कोई खऽ नी वतळावऽ
खाणऽ खऽ होजु तीन तेल को, रोटा देखीनऽ मुँडो बणावऽ
लाड़ऽ लाड़ बिगड़ी गयोज, नऽ चणा का झाड़ पर चढ़ी गयोज
अक्कल मऽ तो बाप सी भी, चार पाँच आगऽ बढ़ी गयोज
ओका दीमाग को पारो सातवाँ आसमान पर चढ़ी गयोज
सोच्यो थो कि नानो भणऽगा-गुणऽगा, नऽ नाँव कमावऽगा
बुढ़ापा मऽ अपणी नाँव खऽ, एक दिन पार लगावऽगा
पण अपणाँ करम मऽ तो- पलास का तीन पान छे
ऊ भी काई करऽ नऽ कहाँ जाय, सरकार का मारे हैरान छे
अवँ तो अजा-अजजा नऽ को मान छे तो अपणो भी भगवान छे
ओखऽ भणई नऽ तो हँऊँ सच्ची मऽ खाड़ा मऽ पड़ी गयोज
ओका दीमाग को पारो सातवाँ आसमान पर चढ़ी गयोज।
- नरेश मांगरोले (नईदुनिया)

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