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अपणों ई रंगी निमाड़


जंगल काटी नऽ ढोयड़ा तू, मत भुई अपणी उजाड़
भूक्यो तीस्यो मरी जासे रे, अपणों ई रंगी निमाड़
हम भुई-माँय का छे दुधमुँहा, हम खऽ ऊ रोज धवाड़ज
ओकाज स्तन खऽ काटाँगा तो, पड़गऽ बुरी लताड़
द्रोपदी सी माटी-माँय की छे चुँदड़ी हरियालई
दुश्शासन सो बणी नऽ मरीगा, मत कर तू चीर-फाड़
हवा-पाणी नऽ मट्टी तक भी, जहरीला हुई रह्‌याज
सारो जहर हम पी नऽ लगावाँ, शंकर जसी दहाड़
साफ-सुथरा भुई आसमाँ, जीवन की पइचान छे
कवई फैलऽ ओमऽ जहर हम, कराँ सब असी जुगाड़
खेत-जंगल सी किरसाण को छे, चोलइ-दामण को साथ
समझँऽ समझाँवाँ सब खऽ इनो सार, कराँ गोबर सी लाड़।

- मंगलेश मुजमेर (नईदुनिया)

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