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11 मार्च, 2008


ब्लॉग्स (2)
महुवो घणो पाक्योज, तो गळज डोकरी, पण मन की मन, तू क्यँऊँ बळज डोकरी। जिनगी की तगारी मऽ, घणा पड्या झारा, समय का टकारा सी, ऊ झळज डोकरी। दुख की राखोड़ी सी, जेतरो जो मँजाण्यो, ऊ घड़ो ओतरो जाफा, उजळज डोकरी। हाँऊँ, नी वात मानतो, पण लोग असा कैज, भाग मऽ जो लिखेलो, ऊ ... आगे पढ़ें...

सीताफल का भाव, मऽ नारी वेचई रईज नारी का बदन से, साड़ी वेचई रईज। मूछ पऽ ताव दईन आँगणऽ बठ्या, डोळा ना का सामनऽ लाड़ी वेचई रईज। कार, मोबाइल ना नऽ धूम मचई दी, लखौंडा नऽ सीमिट का जंगल ना मऽ, खळा नऽ खेत वाड़ी वेचई रईज। पेप्सी नऽ आइसक्रीम नऽ खोब लुभाया, लेण्यो ... आगे पढ़ें...