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छात्ती पऽ एतरा मूँग क्यँऊँ दळज डोकरी!


महुवो घणो पाक्योज, तो गळज डोकरी,
पण मन की मन, तू क्यँऊँ बळज डोकरी।
जिनगी की तगारी मऽ, घणा पड्या झारा,
समय का टकारा सी, ऊ झळज डोकरी।
दुख की राखोड़ी सी, जेतरो जो मँजाण्यो,
ऊ घड़ो ओतरो जाफा, उजळज डोकरी।
हाँऊँ, नी वात मानतो, पण लोग असा कैज,
भाग मऽ जो लिखेलो, ऊ काँ टळज डोकरी।
जिनगी एक टकसाळ, नऽ हम सबई सिक्का,
जसो साँचो, सिक्को वसो ढळज डोकरी।
समय की नद्दी, बवाड़ी नऽ लावज माटी,
समुद्दर को पेंदो बी थळज डोकरी।
पराया दुख मऽ, लोग होज दुबळा घणा,
हेलगा की फाटज, नऽ भयसी फळज डोकरी।
हाथ सी छूटी जाज, हाथ की रेल जँवँ,
राम्याजी को हियो घणो तरतळज डोकरी।
दूर सी तो लगज, यो घणो प्यारो-प्यारो,
पण प्यार को सेवफल, सदा छळज डोकरी।
'वा' बी काई करऽ, नऽ 'यो' बी कोई करऽ,
या उम्मर सबई लोग नऽ खऽ तळज डोकरी।
सीता की कथा तो निमूत मात्र छे भाँयाँ,
सोन्नाा को हिरण सबई खऽ छळज डोकरी।
'अनुज' कऽ रंगई लेणऽ दऽ, संसार का रंग मऽ,
छात्ती पऽ एतरा मूँग क्यँऊँ दळज डोकरी।

- कुँवर उदयसिंह 'अनुज'

प्रतिक्रियाएँ

Re: छात्ती पऽ एतरा मूँग क्यँऊँ दळज डोकरी!
वाकई, बहुत अच्छी है. और आप बहुत अच्छा कर रहे है मालवी-निमाडी भाषा का प्रचार. मुझे अपने गांव की यार आ जाती है. धन्यवाद ऐसी और भी लिखती रहियेगा.
अस्वीकरण