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अप्रैल 2008


ब्लॉग्स (7)
धेला भर नी ओटला की आबरू सोयड़ा बठऽ। ईट-दगड़ा ओटला का पेट मँऽ सब चोरी का। घणो उच्चो छे घमंड को ओटलो बयड़ा जसो। ओटला कऽनी इज्जत कऽ समाळ अनमोल छे। रुखड़ा जसी ओटला की औकात लोटज कुत्रा पापड़ जसो ऊँचो-नीचो ओटलो बढ़ाँतो गचऽ - गोविंद सेन आगे पढ़ें...

सीदो सीदो चल्या करऽ। मत फोकट मऽ मर्‌या करऽ॥ मुश्किल सी यो जलम मिल्यो रे। अच्छा करम तु कर्‌या करऽ॥ खून कवं तक हमरो त्योगऽ। उप्पर वाला सी डर्‌या करऽ॥ चार दिन की चाँदनी छे। मत हवा मऽ उड्या करऽ॥ थारा दिन भी आई सकज रे। मत उनका पऽ हस्या करऽ॥ जिनकऽ तुनऽ कर्जो ... आगे पढ़ें...

कसो जमानो उल्टी आयो? बरसतो पाणी रोकऽ नी धरतीसी पाणी खैचऽ बीजली का बिल सारु बर्तन-भाँडा बेचऽ धरती की खूसबू छोड़ी नऽ लगावऽ अतर को फायो। कसो जमानो उल्टो आयो... गोरा-चिकना बेटा कऽ माय-बाप का चाटऽ बाप सीधी वात कय तो घर छोड़ी नऽ न्हाटऽ मयनतसी मुँडो मोड़ऽ कर्जा मऽ ... आगे पढ़ें...

देखो, उनको नाम हुई गयो, प्रीत मऽ हऊँ बदनाम हुई गयो। हमनऽ कसा महेल बणाया, सुंदर ओमऽ बाग लगाया। फूल तुमारो नाम हुई गयो, काँटो हऊँ बदनाम हुई गयो। देखो कसी सेज सजाई, खुशबूभरी हवा भी आई। नींद तुमारो नाम हुई गयो, सपनो हऊँ बदनाम हुई गयो। जो हमकऽ सपनो आयो, कुछ ... आगे पढ़ें...

महल किना भुलावा मऽ जीवी रयाज। पण एतरो जाणी ले, झोपड़ी की आग उनकऽ खाक करी सकजऽ। राजमार्ग अपणी चिकणाई पऽ गरब करी रयोजऽ। पण पगडंडी की चाल उनकऽ धूल करी सकजऽ। अमीर अपणी मस्ती मऽ घणो मस्त छे। पण, गरीब की आह उनकऽ राख करी सकजऽ। फूल अपणी खुशबू मऽ खूब डोलीऽ महकी ... आगे पढ़ें...

आवो आवो माय गणगौर, धन भाग हमारा। खुल्या खुल्या सबई दरबार, खुल्या घर बार सारा॥ कंकू लगावां, चौखा चढ़ावां, कापड़ो नारियल बधावाँ, कराँ अरज घणी थारी, माय तू खऽ पाटऽ बठाड़ाँ, ननदी जावाँ, ढोल बजावाँ कराँ घणा सिंगार तुम्हारा। अईज बईण पीयर मऽ, द्वार-द्वार खोब ... आगे पढ़ें...

लावाँ-लावाँ रे गणगौर म्हारा घर रणुबाई खऽ लावाँ॥ म्हारा घर... लीपाँ-छाबाँ घर अंगणा खऽ सोरा सैरी गली अंगणा खऽ लावाँ रणुबाई वाट हार॥ म्हारा घर... ढोली बाबा ढोल बजा रे मंग्या दाजी ढोल बजा रे सब बोलो जै जैकार॥ म्हारा घर... जल-नरबदा-सी पाँय पखाराँ पेली चूँदड़ी ... आगे पढ़ें...