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जिनगी का थपेड़ा मऽ


जिनगी का थपेड़ा मऽ हम तो भण्डई गया,
सोच्यो कईं थो नऽ, हाल कईं हुई गया।
खिल्यो-खिल्यो रूप थो, नऽ कसी थी जुवानी,
आवं तो गुठली सी ज्यादा हम चुसई गया।
दुःख-दरद मिलज सदा नऽ होवऽ नाक मऽ दम,
घर-गरस्थी की चक्की मऽ हम तो पिसई गया।
भगवान को नाव लेणऽ देता नी लुगई-बच्चा,
कसो म्हारा जीव खऽ आग मऽ तपई रयाज।
ऐ 'अखिलेश' या जिनगी कुड़तऽ कळपतऽ जावगऽ,
दियो जऽ माथो उख्खल मऽ मूस्सल सी दबई गया।

- अखिलेश जोशी

प्रतिक्रियाएँ

Re: जिनगी का थपेड़ा मऽ
जितेंद्रजी आप मालवी कविताएं पढ़वाकर बहुत ही बेहतर काम कर रहे हैं। हम अपनी बोलियों को इसी तरह बचा सकते हैं। मैं खुद एक मालवी हूं औऱ मेरी मां जब घर में मालवी बोलती है तो मैं भी मालवी में ही बात करता हूं। बोलियों का बचाने का यही एक तरीका हो सकता है। बस एक गुजारिश है कि मालवी कविताएं देने में चयन में थोड़ी सावधानी बरतना होगी। धन्यवाद और बधाई।
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