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कईं होयगो इना देस को


कई होयगो इना देस को
पुलिस कचरो करे केस को
दफतर-दफतर बैठ्या दलाल,
अफसरज खींचे है खाल,
जुवान पढ़े रस्तो ले बिदेस को,
कईं होयगा इना देस को,
नेता कुरछी के है तोड़े,
जम्या रेवे पद नी छोड़े,
चलाय तमाशो करे 'केश' को
कईं होयगा इना देस को
गाँधी नेहरू सुभाष भगत,
अमर होया, करवई दुर्गत,
भूली जनता रस्तो पकड़्‌यो कलेश को,
कईं होयगा इना देस को।

- गफूर 'स्नेही'

प्रतिक्रियाएँ

Re: कईं होयगो इना देस को
मालवी की मिठास लिए यह तीखे व्यंग्य वाली कविता सचमुच मेजदार है। भाषा के वर्चस्व से लड़ने का एक तरीका यही हो सकता है कि हम अपनी बोलियों में रचनात्मक काम लगातार करते रहें।
अस्वीकरण