जेठ मइना
धरती असी तपऽ
धाणी सेकी लऽ॥
पंस्यो ववज
माथा सी पाँय तक
झरऽ झिराला॥
बाप रे बाप
हवा दपड़ी गई
घाम देखी नऽ॥
पड्या दराड़ा
घाम का आतंक सी
रड़ नी फूटऽ॥
सन्नााटो छायो
आतंकी घामला सी
करफ्यू जसो॥
सुकई गया
नद्दी-नाला-तलाव
सुर्या को कोप॥
पाणी का लेणऽ
तरसी रया लोग
जीव-जंतु भी॥
- चंद्रकांत सेन

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