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मोबाइल पऽ वात


रस्तऽ चलतऽ वात हुई गई
मोबाइल पऽ वात हुई गई

सुणी संदेसो मन हरखायो
मन किलोल-कुचमात हुई गई

प्यार-मिलन को वायदो हुयो
तय बी टेम संगात हुई गई

मन को पंछी उड्यो फड़फड़ी
जाणुं वाड़ी की वाट हुई गई

सपना डोला न मऽ सजाया
फेरा पड्या वरात चली गई

डोली इदाई की उठी गई
घर जाति जमात चली गई

- गजाननसिंह चौहान 'नम्र'

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