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बरसे क्यों नई रे


काळा-काळा बादळा,
अई जा-अई जा बादळा।
धरती करे हे पुकार,
तू आवे क्यों नई रे।

नद्दी नाळा सूकी ग्या,
कुआ बी सूकी ग्या।
बिन पाणी के तरसे लोग,
तू बरसे क्यों नई रे।

बाग बी सूकी र्‌या,
जंगलना बी उजड़ी र्‌या।
हर्‌यो-भर्‌यो नी हे चारी ओर,
तू आवे क्यों नई रे।
मोर बी तरसी र्‌या,
डेंडका बी तड़फी र्‌या।
होय घटा ना घनघोर,
तू बरसे क्यों नई रे।

बिजळी बी चमकी री,
हिवड़ा के धड़कई री।
लोग मचई र्‌या हे शोर,
तू आवे क्यों नई रे।

धरती माता तपी ग्या,
आसमान बी तपी ग्या।
चारी दिसा हे बेचेन,
छमा-छम बरसे क्यों नई रे।

- डॉ. शशि निगम

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