घर में रेवे
चार मनक
दो नाना,
दो मोटा
भेरु सुद्दा।
दाड़की करे
भुसांदो हुई जाय
बीस को आटो,
पाँच की साग
तेल कोनी
लून-मरच
लाखी ने पेट की
आग बुझाय।
बीड़ी-माचिस
तमाकू-सुपारी,
तीन कावा की चा
पे, दनेज तीस
उठाड़े है।
थाक्यो भेरू
कलाली की बाट नी
भूले साब।
नरकस देसी को
दीवानो,
अद्दो सवी सांज को
लाखी आय।
मकान भाड़ो,
कपड़ा-लत्ता
दवा-दारू
आया-गया
टीवी ने
मोबाइल पे
सबके सादे हे।
नवी, जूनी ने अंग्रेजी
सब तरे की फिलम
को सोकीन परदा कने
खुनिया में बेठो-बेठो
चना-मुमफली चाबे हे
धोली दाड़ी
पीली पट बत्तीसी
मेल खोर्या कपड़ा में
मोटो पेट वालो
भेरू घना दाँत काड़े हे।
मेला, ठेला, जात्रा में
घराली ने बच्चा संग
झूलो झूले,
चाट पकौड़ा
उड़ावे है।
गुस्सो कँई होय
यो नी जाने
अपनी पेमां के
ऊ कालजा में राखे हे
ऐसो गोल्ड मेडलिस्ट
भेरू, नानो-मोटो
सबकी रग-रग
जाने हे।
- जगमोहन 'सजग'

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