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एक ज्ञान की बात


एक ज्ञान की बात सुणाऊँ, जरा तुम सुणता जाजो रे,
रस्तऽ चखतऽ मिलऽ सबई ख तुम कहेता जाजो रे,
विद्या को तो मान घणो छे, विद्या धन महान छे,
विद्या बिना तो मनुसन पशु, दुदई एक समान छे,
चोर नी चोरऽ एखऽ, भाई नी पाड़ऽ एमऽ वाटो रे,
जेतरी खरचो दूणी बढ़ऽ, पड़ऽ नी एमऽ घाटो रे
बूँद-बूँद सी सागर भरऽ, कण कण जोड़ऽ बणऽ धनवान रे
एक-एक अक्षर भी पढ़ऽ तो मूरख बणऽ सुजान रे,
इनी बात खऽ सब खऽ भाई, समझावता जाओ रे
रस्तऽ चलतऽ मिलऽ

भूलो पैखी बात नऽ सारी-मत करो पश्चाताप रे
मणी गुणी नऽ ज्ञान बढ़ाओ, मत रहो अँगठा छाप रे
गाँव-गाँव मऽ स्कूल खुल्या, मास्टर फिरऽ गली-गली
बिन पैसा को ज्ञान लुटावऽ, बतावऽ वात नऽ भली-भली
ज्ञान बड़ो छे धन दौलत सी, सब खऽ भी बतलावजो रे
अड़ोस-पड़ोस नऽ हित्तुभाई, सब खऽ भी समझाव्जो रे
विद्या तो अनमोल रतन छे, एखऽ तुम लेता जाजो रे
रस्तऽ चलतऽ मिलऽ

भण्णऽ को छे घणो फायदो, भला बुरा रवऽ जाणो गा
कुण छे हित्तू कुण छे दुसमन, इनखऽ तुम पैचाणोगा
लेण-देण को हिसाब किताब अपणाँ हाथ सी लिखोगा
अच्छी खेती करनऽ का भी-नित नवा तरीका सीखोगा
दुख की बीती रात अँधारी, सुख को हुयो उजालो रे।
भूख, गरीबी, बीमारी को- करी देओ मुँढो कालो रे
एक दिया सी दियो दूसरो- सुलगावता जाजो रे
रस्तऽ चलतऽ मिलऽ

- रे.शं. मांगरोले

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