डोला बण्या अकास नऽ काजल बणी वादलो छायो।
उड़ी बाल की लट नऽ असी आखो मुंडो ढकायो॥
चमकी कपाल उप्पर टिकी जिको फैल्यो उजालो।
दपडायो साड़ी का पल्ला न चाँद मुंडो मतवालो॥
चोटी मऽ फबी उठ्यो रे फुंदो लटक्यो सोभा वालो।
लगऽ नाक मऽ नथनी असी दियो तिजोरी तालो॥
नवली को सिणगार सलोनो प्यारो मन कऽ फायो।
डोला बण्या अकास नऽ काजल बणी वादलो छायो॥
भापड़ सी तवंऽ लग्यो झाकणंऽ जवंऽ सुहावणो काजल।
लगऽ सुहावणी स्याण पांय मऽ वाजऽ छम-छम पायल॥
बारीक रेख का काजल न मन असो बणायो घायल।
मिली नजर सी जवंऽ नजर तो हिरदो हुइगो कायल॥
नवली लाड़ी का रूप फूल पऽ मन भँवरो ललचायो।
डोला बण्या अकास नऽ काजल बणी वादलो छायो॥
बिन पाणी को कालो बादलो मन को मोर नचावऽ।
स्वाती रूप सलोनो देखी मन को पपीहो गावऽ॥
असो निगा मऽ काजल वादलो उमडी न इठलावऽ।
डोला नसी रूप मुंडा को हिरदा उतरी आवऽ॥
नवली की बानगी अदा पऽ चंचल मन इठलायो।
डोला बण्या अकास नऽ काजल बणी वादलो छायो॥
रई रई नऽ वादला सी दादुर चम्म चम्मा चम चमकऽ।
मिलण कऽ चकलावऽ छाती जवणों डोलो फड़कऽ॥
सुख तिरप को मिल्यो सलोनो छाती धड़-धड़ धड़कऽ।
रूप सलोनो बस्यो निगा मऽ साजन देखी भयकऽ॥
जोवन की झूमती डाली नऽ असो झूलो झुलायो।
डोला बण्या अकास नऽ काजल बणी वादलो छायो॥
-गजाननसिंह चौहान 'नम्र'
लोड हो रहा है...