सावन रा सेरा शिरू, मण म्हारो हरसाय।
म्हूँ भींगा बदन तरसूं, कद पिया घर आय॥
उड़ता-उड़ता बादला, पलक झपकता आय।
कईं सपटनी पड़े रे, कद बरसी ने जाय॥
फुहाराँ घुस के म्हारा, पीछे-पीछे आय।
हात पकड़ी के सगला, घर में नाच नचाय॥
बूँदा टपकी के अबे, चूमे हे रे गाल।
फैल्या सिन्दूर ती रे, चेरो होयो लाल॥
धड़के हियो झूला में, असी फरफरी लाय।
नीचे रो धड़ ऊपरे, आता ई थर्राय।
डुंगरी चादर ओढ़ के, घणी रई इतराय।
अण बूढ़ी बांवली के, भई कूण समझाय॥
मोती बेरातो आयो, मौसम यो 'नवनीत'।
क्यारे-क्यारे बई री, पानी जैसी प्रीत॥
सावन साजन सुनाजे, म्हारा मण की पीर।
सांते लईके आजे, जद बरसाजे नीर॥
- नरेन्द्र श्रीवास्तव 'नवनीत'
लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ