- नरहरि पटेल
तवा सा तमतमाता त्रास का दन
तरस का तिलमिलाता प्यास का दन
तवे से तमतमाते त्रास के दिन
तरसते तिलमिलाते प्यास के दिन
अलूणी साँझ रात खाटी है
निठारा निरजला उपास का दन
ये फीकी साँझ -रात नफ़रत की
निपट ये निरजले उपवास के दिन
खाली हे कुवाँ-बावडी,खाली हे घट
उखड़ती सांस का विनास का दन
ख़ाली हैं कुएँ-बावडी और घट
घुटन के हैं उखड़ती सांस के दिन
तीखा तीखा हे बोल घाव घणा
दोगला दरद का हे फ़ाँस का दन
तीख़े तीख़े से हैं ये घाव बहुत
दर्द के दोगले ये फ़ाँस के दिन
आव-आदर नीं कोई प्रीत सरम
खाटा खाटा कसा खटास का दन
न कोई प्रेम-आदर लाज न शर्म
ये कैसे कटकटे खटास के दिन
हत्या हे द्वेस न्याव नी कोई
दनछता ई कसा उजास का दन
हत्या है द्वेश है और न्याय नहीं
ये कैसे उजले-उजास के दिन
पीड़ा लम्बी घणी हे छाया गुम
खजूर-खेजड़ा का बाँस का दन
नहीं छाया है लम्बी पीड़ाएँ
बबूल,खजूर और बाँस के दिन
थू थू नाता थू थू कड़वा रिस्ता
’पटेल’ हे कठे मिठास का दन
थू थू नाते हैं और कड़वे रिश्ते
पटेल कहाँ हैं वो मिठास के दिन
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