जंगल काटी नऽ ढोयड़ा तू, मत भुई अपणी उजाड़भूक्यो तीस्यो मरी जासे रे, अपणों ई रंगी निमाड़हम भुई-माँय का छे दुधमुँहा, हम खऽ ऊ रोज धवाड़जओकाज स्तन खऽ काटाँगा तो, पड़गऽ बुरी लताड़द्रोपदी सी माटी-माँय की छे चुँदड़ी हरियालईदुश्शासन सो बणी नऽ मरीगा, मत कर तू ... आगे पढ़ें...
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म्हारो नानो काळू अंग्रेजी का चार अक्षर काई पढ़ी गयोज,ओका दीमाग को पारो-सातवाँ आसमान पर चढ़ी गयोज।मनऽ ओका लेणऽ देखी थी भला घर की एक छोरी,काम धन्दा मऽ चतुर नऽ देखणा मऽ थी गोरीऊ ओखऽ पसंद नी आई-कैणऽ लग्यो ओकी तो-चपठी नाक छे, पिचकायेल गाल छेल।बड़ा-बड़ा डोळा छे नऽ ... आगे पढ़ें...
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इना बरस भी खूब बरस, म्हारा इंदर देवजी सरस। खेत जंगल न्हई रिया खाल-नाल बेवई रिया। मोर-पपैया कोयल मिली के मंगल गान सुनई रिया। इंदर धनुष देवे दरस। इना बरस भी खूब बरस। जईं देखो वईं हरयाली हरयाली माय खुशयाली। बेल बेलड़ी झाड़ चढ़या हवा नवा जीजा की साली। उकी बेग ... आगे पढ़ें...
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भारत के अन्य राज्यों की भांति मालवा की भी राजनीतिक सीमाएं राजनीतिक गतिविधियों व प्रशासनिक कारणों से परिवर्तित होती रही है। अनेक ऐतिहासिक साक्ष्यों एवं भौगोलिक स्थिति के आधार पर प्राचीन मालवा के भौगोलिक विस्तार के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के अलग- अलग ... आगे पढ़ें...
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प्राकृतिक बनावट के आधार पर संपूर्ण मालवा क्षेत्र को चार भागों में बाँटा जा सकता है -- उत्तर- पूर्वी पठार क्षेत्र (दशार्ण क्षेत्र)केंद्रीय पठार क्षेत्रउत्तर- पश्चिमी पठार क्षेत्र तथानर्मदा की घाटी (निमाड़ की समतल भूमि) उत्तर- पूर्वी पठार क्षेत्र (दशार्ण ... आगे पढ़ें...
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भारतवर्ष की वह भौगोलिक इकाई, जिसे प्राचीनकाल में मालवा या मालव के नाम से जाना जाता था, वर्तमान में मध्यप्रदेश प्रांत के पश्चिमी भाग में २१#ं७ से २५#ं१ उत्तरी अक्षांश तथा ७३#ं४५ से ७९#ं१४ पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है। समुद्र तल से इसकी औसत ऊँचाई ४९६ मी. ... आगे पढ़ें...
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दूर देस मंऽ जावाँ कसा,गीत खुसी का गावाँ कसा।नरबदा मैया खऽ छोड़ी नऽगाँव का खोदरा मंऽ न्हावाँ कसा।गया था घर सी कळो करी नऽ,घर मंऽ पछा आवाँ कसा।काँटा रस्ता मंऽ वाया उन नऽहम फूल बिछावाँ कसा।बीज बोबळ्या का वाया था,मीठो आँबो पावाँ कसा।सासू खऽ रोटा दीया नी कदी,वऊ ... आगे पढ़ें...
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जंगल-जंगल, बैड़ी-बैड़ी टेसू फूल्याटेसू फूल्या नऽ, म्हारा मन झूल्या॥(१) सागवान खऽ देखो ओका पत्ता-पत्ता झड़ी गयाअनऽ अम्बा नऽ मौर नऽप म्हारा डोळा गड़ी गयाबर्रफ जसा ठंडा-ठंडा, दिन धूल्या,जंगल-जंगल, बैड़ी-बैड़ी टेसू फूल्या॥(२) म्हारा गाँव की नद्दी की बी, पीठ उघाड़ी ... आगे पढ़ें...
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बदली गयो है अबे जमानो, अने बदली गया है लोग।माखन-मिश्री भूलो कान्हा, लगे है अब पिज्जा को भोग॥टीवी दादा की जै हो, भूली गया सगला खेल।पकड़म पाटी बी गई, ने अबे गई छुक-छुक रेल॥आखी दुनिया सामे है, जै कम्पुटर महाराज।एक जगे बैठा-बैठा, कर लो सगला काज॥बुरई-भलई मत ... आगे पढ़ें...
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शिक्षाफूल का खिलने से, खुशबू बिखरी जावे है।चाँद का निकलने से चाँदनी निखरी जावे है।तेवहारहमारी संस्कृति की धरोहर है ई तेवहार।भागमभाग में जीवन हुई गयो दुसवार।मिलवा-जुलवा की फुरसत किने है आजकल,ई तेवहार ईज तो, भेला करे है परिवार॥कैसो जमानोबात-बात पे हादसो, ... आगे पढ़ें...
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"मालवा तथा "मालया दोनों ही शब्द हमें विभिन्न साहित्यिक स्रोतों, अभिलेखों व सिक्कों में मिलता है। पाणिनि ने "अष्टाध्यायी में मालवों का उल्लेख किया है। साथ- ही- साथ कई धार्मिक ग्रंथों, जैसे - विष्णुधर्मोत्तरपुराण... आगे पढ़ें...
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भिनसरे-उठवा को जमानो गयोदेर से जगने को जमानो आयो नयोअबे सासू पेला उठे, बऊ जागे सासू का बादक्यूँ कि बहू देखे टीवी आदी आदी रातमुंडा-हात धोवा का पेला बऊ-बेटा बिस्तर में चाय पीवेसासू बापड़ी बनई ने धरे-ससरो देखी ने मुंडो सीवेबबूल नीम की दातून अब अई-गई हुई गई ... आगे पढ़ें...
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जदे कोई अपणा से केवे-चालो कथा-भागवत सुणवा चालाँतो अपण केवाँ- टेम कोनी।जदे कोई अपणा से केवे-चालो सिनेमा देखवा चालाँतो अपण केवाँ-चालो-चालो टेम नी हुई जावे।-कांतिलाल ठाकरे (नईदुनिया) आगे पढ़ें...
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सेळई दऽ मत न्हाटड,कुतरा जसो मत काटऽ।सपड़ा ईमान को मही नऽ घाट,हांडी दूसरा की मत चाटऽ।दूसरा नऽख उल्लू समजी नऽ,तू खोबऽ कानून मत छाटऽ।करी नऽ गलती धांय-धांय तू,दूसरा नऽ खऽ मत डाटऽ।रावण की सोना की लंका नी रई,तू घमंड मंऽ मत फाटऽ।वैतरणी नीरबदा खऽ फोड़ी नऽ महेशकपट ... आगे पढ़ें...
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1)नीरी री...नीरी रीघर में आटो पीसी रीनानो खाए रोटी बाटीसककर की तो तीन-तीन आँटीनीरी री...नीरी रीनानो पेने (पहने) झबला धोतीहाथ में कंगन गला में मोतीनीरी री नीरी री२)सोना की गाडी़ पेनानो घूमे साथी-संगी,नाचे झूमेनाना के माथा पे लाल टोपीमाँ बई माथो चूमेनाना का ... आगे पढ़ें...
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