सावन रा सेरा शिरू, मण म्हारो हरसाय।म्हूँ भींगा बदन तरसूं, कद पिया घर आय॥उड़ता-उड़ता बादला, पलक झपकता आय।कईं सपटनी पड़े रे, कद बरसी ने जाय॥फुहाराँ घुस के म्हारा, पीछे-पीछे आय।हात पकड़ी के सगला, घर में नाच नचाय॥बूँदा टपकी के अबे, चूमे हे रे गाल।फैल्या सिन्दूर ...
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